Mukti Bodh Sumiran Ke Ang ka Saransh

सुमिरन के अंग का सारांश | Muktibodh

संत गरीबदास जी ने अपनी अमृतवाणी रूपी वन में प्रत्येक प्रकार के पेड़-पौधे, जड़ी-बूटियां, फूल, फलदार वृक्ष, मेवा की लता आदि-आदि उगाए हैं। इसका मुख्य कारण यह रहा है कि जो मूल ज्ञान है, उसको गुप्त रखना था। यह परमात्मा कबीर जी का आदेश था। इसी कारण से संत गरीबदास जी ने अनेकों वाणियाँ कही हैं। मन की आदत है कि यदि कम वाणी हैं तो उनको कण्ठस्थ करके अरूचि करता है। ये ढे़र सारी अमृतवाणी लिखवाकर संत गरीबदास जी ने मन को व्यस्त तथा रूचि बनाए रखने का मंत्र बताया है। मन पढ़ता रहता है या सुनता रहता है, आत्मा आनन्द का अनुभव करती है।

वाणी नं. 18 में कहा है कि:-

गरीब, राम कहा तो क्या हुआ, उर में नहीं यकीन। चोर मुसें घर लूटहि, पाँच पचीसों तीन।।18।।

भावार्थ:– यदि साधक को परमात्मा पर विश्वास ही नहीं है तो नाम-सुमरण का कोई लाभ नहीं। उसके मानव जीवन को काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार रूपी पाँच चोर मुस (चुरा) रहे हैं। इन पाँचों की पाँच-पाँच प्रकृति यानि 25 ये तथा रजगुण के आधीन होकर कोठी-बंगले बनाने में, कभी कार-गाड़ी खरीदने में जीवन नष्ट कर देता है। सतगुण के प्रभाव से पहले तो किसी पर दया करके बिना सोचे-समझे लाखों रूपये खर्च कर देता है। फिर उसमें त्रुटि देखकर तमोगुण के प्रभाव से झगड़ा कर लेता है। इस प्रकार तीन गुणों के प्रभाव से मानव जीवन नष्ट हो जाता है। यदि तत्त्वदर्शी संत से ज्ञान सुनकर विश्वास के साथ नाम का जाप करे तो जीवन सफल हो जाता है।

जिन-जिन भक्तों ने मर्यादा में रहकर जिस स्तर की भक्ति, दान आदि-आदि किया है, उनको लाभ अवश्य मिला है। उदाहरण बताया है कि:-

(वाणी नं. 31 से 39 में) = गोरखनाथ, दत्तात्रो, शुकदेव, पीपा, नामदेव, धन्ना भक्त, रैहदास (रविदास), फरीद, नानक, दादू, हरिदास, गोपीचंद, भरथरी, जंगनाथ (झंगरनाथ), चरपटनाथ, अब्राहिम अधम सुल्तान, नारद ऋषि, प्रहलाद भक्त, धु्रव, विभीक्षण, जयदेव, कपिल मुनि, स्वामी रामानंद, श्री कृष्ण, ऋषि दुर्वासा, शंभु यानि शिव, विष्णु, ब्रह्मा आदि सबकी प्रसिद्धि पूर्व जन्म तथा वर्तमान में की गई नाम-सुमरण (स्मरण) की शक्ति से हुई है, अन्यथा ये कहाँ थे यानि इनको कौन जानता था? इसी प्रकार आप भी तन-मन-धन समर्पित करके गुरू धारण करके आजीवन भक्ति मर्यादा में रहकर करोगे तो आप भी भक्ति शक्ति प्राप्त करके अमर हो जाओगे। जिन-जिन साधकों ने जिस-जिस देव की साधना की, उनको उतनी महिमा मिली  है।

कबीर जी ने कहा है कि:-

जो जाकि शरणा बसै, ताको ताकी लाज। जल सौंही मछली चढ़ै, बह जाते गजराज।।

भावार्थ:– जो साधक जिस राम (देव-प्रभु) की भक्ति पूरी श्रद्धा से करता है तो वह राम उस साधक की इज्जत रखता है यानि उसको अपने सामथ्र्य अनुसार अपने क्षेत्र में पूर्ण लाभ देता है।

उदाहरण दिया है कि जैसे मछली का जल से अटूट नाता है। वह कुछ समय ही जल से दूर होने पर तड़फ-तड़फकर प्राण त्याग देती है। ऐसी श्रद्धा देखकर जल ने उसको अपने क्षेत्र में पूर्ण स्वतंत्रता दे रखी है। उसको कोई रोक-टोक नहीं है। जैसे ऊँचे स्थान (थ्ंसस) से 50 फुट से दरिया का जल गिर रहा होता है। वह जल की धारा बड़े से बड़े हाथी यानि गजराज को भी बहा ले जाती है जो हाथियों का राजा होता है। परंतु अपनी पुजारिन मछली को पूरी स्वतंत्रता दे रखी है। वह उस गिरते पानी में नीचे से ऊपर (50 फुट तक) चढ़ जाती है। इसी प्रकार जो साधक जिस प्रभु की पूरी श्रद्धा से भक्ति करता है तो वह प्रभु अपने भक्त को अपने स्तर का लाभ अपनी क्षमता के अनुसार पूरा देता है।

समझने के लिए सामान्य उदाहरण:-

अपने देश में अभी तक अंग्रेजों वाली परंपरा का प्रभाव भी है। जैसे किसी सामान्य व्यक्ति को पुलिस थाने से बुलावा आता है तो उसके लिए बड़ी आपत्ति होती है। थाने के आस-पास से भी सामान्य व्यक्ति डरकर जाता है। बुलावा आने पर तो उसके साथ क्या बीतेगी? स्पष्ट है। जाते ही लगभग प्रत्येक पुलिसकर्मी तथा थानेदार का दुव्र्यवहार झेलना पड़ता है। मारपीट तो पहला प्रसाद है। गाली देना पुलिस वालों का मूल मंत्र है।

उसी थाने में किसी का मित्र थानेदार लगा है। वह व्यक्ति वहाँ जाता है तो थानेदार उसे कुर्सी पर बैठाता है, चाय-पानी पिलाता है। इस प्रकार जो व्यक्ति जिस अधिकारी का मित्र है, वह अपने स्तर की राहत अवश्य देता है। वह राहत उस सामान्य व्यक्ति के लिए असहज होती है यानि सामान्य नहीं होती, परंतु वह पर्याप्त भी नहीं है। यदि पुलिस अधीक्षक से मित्रता हो जाए तो थानेदार भी नतमस्तक हो जाता है। यदि मंत्री जी से मित्रता हो जाए तो एस.पी. भी नतमस्तक हो जाता है। यदि मुख्यमंत्री-प्रधानमंत्री के साथ मेल हो जाए तो नीचे के सर्व अधिकारी-कर्मचारी आपके साथ हो जाएंगे। इसी प्रकार यदि कोई किसी देवी-देव, माता-मसानी, सेढ़-शीतला, भैरो-भूत तथा हनुमान जी की भक्ति करता है तो उसको उनका लाभ अवश्य होगा, परंतु गीता अध्याय 16 श्लोक 23-24 में तथा अध्याय 7 श्लोक 12-15 तथा 20 से 23 तक में बताए अनुसार व्यर्थ साधना होने से मोक्ष से वंचित रह जाते हैं। कर्म का फल भी अच्छा-बुरा भोगना पड़ता है। इसलिए यह साधना करके भी हानि होती है। इसलिए संत गरीबदास जी ने वाणी नं. 38 में कहा है कि:-

गरीब, ऐसा निर्मल नाम है, निर्मल करे शरीर। और ज्ञान मण्डलीक हैं, चकवै ज्ञान कबीर।।

भावार्थ:– वेदों, गीता, पुराणों, कुरान, बाईबल आदि का ज्ञान तो मण्डलीक यानि अपनी-अपनी सीमा का है।(क्पअपेपवदंस है) परंतु परमेश्वर कबीर जी द्वारा बताया आध्यात्म सत्य ज्ञान यानि तत्त्वज्ञान (सूक्ष्मवेद) चक्रवर्ती ज्ञान है जिसमें सब ज्ञान का समावेश है। वह कबीर वाणी है।

वाणी नं. 41-42:-

गरीब, गगन मण्डल में रहत है, अविनाशी आप अलेख। जुगन-जुगन सत्संग है, धर-धर खेलै भेख।।41।।
गरीब, काया माया खण्ड है, खण्ड राज और पाट। अमर नाम निज बंदगी, सतगुरू सें भई साँट।।42।।

भावार्थ:– पूर्ण परमात्मा कबीर जी गगन मण्डल यानि आकाश में रहता है जो अविनाशी अलेख है।{अलेख का अर्थ है जो पृथ्वी से देखा नहीं जा सकता। जिसे अविनाशी अव्यक्त गीता अध्याय 8 श्लोक 20 से 23 में कहा है। जैसे कुछ ऋषिजन दिव्य दृष्टि के द्वारा पृथ्वी से स्वर्ग लोक, श्री विष्णु लोक, श्री ब्रह्मा लोक तथा श्री शिव जी के लोक को तथा वहाँ के देवताओं को तथा ब्रह्मा-विष्णु-महेश को देख लेते थे। परंतु ब्रह्म काल को तथा इससे ऊपर अक्षर पुरूष तथा परम अक्षर पुरूष (अविनाशी अलेख) को कोई नहीं देख सकता। जिस कारण से उस परमात्मा का यथार्थ उल्लेख ग्रन्थों में नहीं है। यथार्थ वर्णन सूक्ष्मवेद में है जो स्वयं परमात्मा द्वारा बताया अध्यात्म ज्ञान है। इसलिए उस पूर्ण परमात्मा को अलख तथा अलेख कहकर उपमा की है। उस परमेश्वर को देखने के लिए पूर्ण सतगुरू जी से दीक्षा लेकर तब सतलोक जाकर ही देखा जा सकता है।} वह परमात्मा स्वयं अन्य भेख (वेश) धारण करके पृथ्वी पर प्रत्येक युग में प्रकट होता है। अपना तत्त्वज्ञान (चक्रवर्ती ज्ञान) स्वयं ही बताता है कि यह सब राज-पाट तथा शरीर खण्ड (नाशवान) है। केवल सतगुरू से मिलन तथा उनके द्वारा दिया निज नाम (सत्य भक्ति मंत्र) ही अमर है।

यदि सच्चे भक्ति मंत्र प्राप्त नहीं हुए तो अन्य नामों का जाप (सुमरण) तथा यज्ञ करना सब व्यर्थ है।

सुमरण के अंग की वाणी नं. 20 में कहा है कि:-

गरीब, राम नाम निज सार है, मूल मंत्र मन मांहि। पिंड ब्रह्मंड सें रहित है, जननी जाया नाहिं।।20।।

भावार्थ:– संत गरीबदास जी ने कहा है कि मोक्ष के लिए राम के नाम का जाप ही निज सार है। यानि मोक्ष प्राप्ति का निष्कर्ष है। नाम-स्मरण से ही मुक्ति होती है। नाम भी मूल मंत्र यानि यथार्थ नाम हो। जिस पूर्ण परमात्मा का जो मूल मंत्र यानि सार नाम है, वह परमेश्वर पिण्ड यानि नाड़ी तंत्र से बने पाँच तत्त्व के शरीर से रहित (उसका पाँच तत्त्व का शरीर नहीं है) है। परमात्मा का जन्म किसी माता से नहीं हुआ।(20)

वाणी नं. 21:-

गरीब, राम रटत नहिं ढील कर, हरदम नाम उचार। अमी महारस पीजिये, योह तत बारंबार।।21।।

हे साधक! पूर्ण गुरू से दीक्षा लेकर उस राम के नाम की रटना (जाप करने में) में देरी (ढ़ील) ना कर। प्रत्येक श्वांस में उस नाम को उच्चार यानि जाप कर। यह स्मरण का अमृत बार-बार पी यानि कार्य करते-करते तथा कार्य से समय मिलते ही जाप शुरू कर दे। इस अमृत रूपी नाम जाप के अमृत को पीता रहे। यह तत यानि भक्ति का सार है। (21)

यदि यथार्थ नाम प्राप्त नहीं है तो चाहे पुराणों में वर्णित धार्मिक क्रियाएँ करोड़ों गाय दान करो, करोड़ों धर्म यज्ञ, जौनार (जीमनवार = किसी लड़के के जन्म पर भोजन कराना) करो, चाहे करोड़ों कुँए खनों (खुदवाओ), करोड़ों तीर्थों के तालाबों को गहरा कराओ जिससे जम मार (काल की चोट) यानि कर्म का दण्ड समाप्त नहीं होगा।

वाणी नं. 22:-

गरीब, कोटि गऊ जे दान दे, कोटि जग्य जोनार। कोटि कूप तीरथ खने, मिटे नहीं जम मार।।22।।

जैसे किसी देव या संत के नाम का मेला लगता है। उसका स्थान किसी छोटे-बड़े जलाशय के पास होता है। श्रद्धालुओं को उस तालाब से मिट्टी निकलवाने को कहा जाता है तथा उसको पुण्य का कार्य कहा जाता है। यदि सतनाम का जाप नहीं किया तो मोक्ष नहीं होगा। साधक को अन्य साधना का फल स्वर्ग में समाप्त करके पाप को नरक में भोगना होता है। इसलिए सब व्यर्थ है। (22)

वाणी नं. 23:-

गरीब, कोटिक तीरथ ब्रत करी, कोटि गज करी दान। कोटि अश्व बिपरौ दिये, मिटै न खैंचातान।।23।।

चाहे करोड़ों तीर्थों का भ्रमण करो, करोड़ों व्रत रखो, करोड़ों गज (हाथी) दान करो, चाहे करोड़ों घोड़े विप्रों (ब्राह्मणों) को दान करो। उससे जन्म-मरण तथा कर्म के दण्ड से होने वाली खेंचातान (दुर्गति) समाप्त नहीं हो सकती। (23)

वाणी नं. 24:-

गरीब, पारबती कै उर धर्या, अमर भई क्षण मांहिं। सुकदेव की चैरासी मिटी, निरालंब निज नाम।।24।।

वाणी नं. 24 का भावार्थ है कि जैसे पार्वती पत्नी शिव शंकर को जितना अमरत्व (वह भगवान शिव जितनी आयु नाम प्राप्ति के बाद जीएगी, फिर दोनों की मृत्यु होगी। इतना मोक्ष) भी देवी जी को शिव जी को गुरू मानकर निज मंत्रों का जाप करने से प्राप्त हुआ है। ऋषि वेद व्यास जी के पुत्र शुकदेव जी को अपनी पूर्व जन्म की सिद्धि का अहंकार था। जिस कारण से बिना गुरू धारण किए ऊपर के लोकों में सिद्धि से उड़कर चला जाता था। जब श्री विष्णु जी ने उसे समझाया और स्वर्ग में रहने नहीं दिया, तब उनकी बुद्धि ठिकाने आई। राजा जनक से दीक्षा ली। तब शुकदेव जी की उतनी मुक्ति हुई, जितनी मुक्ति उस नाम से हो सकती थी। परमेश्वर कबीर जी अपने विधान अनुसार राजा जनक को भी त्रोतायुग में मिले थे। उनको केवल हरियं नाम जाप करने को दिया था क्योंकि वे श्री विष्णु जी के भक्त थे। वही मंत्र शुकदेव को प्राप्त हुआ था। जिस कारण से वे श्री विष्णु लोक के स्वर्ग रूपी होटल में आनन्द से निवास कर रहे हैं। वहीं से विमान में बैठकर अर्जुन के पौत्र यानि अभिमन्यु के पुत्र राजा परीक्षित को भागवत (सुधा सागर की) कथा सुनाने आए थे। फिर वहीं लौट गए।

गरीब, ऋषभ देव के आईया, कबि नामें अवतार। नौ योगेश्वर में रमा, जनक विदेही उधार।।

भावार्थ:- परमेश्वर कबीर जी अपने विधान अनुसार {कि परमात्मा ऊपर के लोक में निवास करता है। वहाँ से गति करके आता है, अच्छी आत्माओं को मिलता है। उनको अपनी वाक (वाणी) द्वारा भक्ति करने की प्रेरणा करता है आदि-आदि।} राजा ऋषभ देव (जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर) को मिले थे। अपना नाम कविर्देव बताया था। ऋषभ देव जी ने पने धर्मगुरूओं-ऋषियों से सुन रखा था कि परमात्मा का वास्तविक नाम वेदों में कविः देव (कविर्देव) है। परमात्मा कवि ऋषि नाम से ऋषभ देव को भक्ति की प्रेरणा देकर अंतध्र्यान हो गए थे। नौ नाथों (गोरखनाथ, मच्छन्द्रनाथ, जलंदरनाथ, चरपटनाथ आदि) को समझाने के लिए उनको मिले तथा राजा जनक विदेही (विलक्षण शरीर वाले को विदेही कहते हैं) को सत्यज्ञान बताकर उनको सही दिशा दी। परंतु राजा जनक ने विष्णु उपासना को नहीं त्यागा। राजा जनक से दीक्षा लेकर शुकदेव ऋषि को स्वर्ग प्राप्त हुआ। परंतु वह पूर्ण मोक्ष नहीं मिला जो गीता अध्याय 15 श्लोक 4 में कहा हैः-

(तत्त्वदर्शी संत से तत्त्वज्ञान समझने के पश्चात्) अध्यात्म अज्ञान को तत्त्वज्ञान रूपी शस्त्र से काटकर उसके पश्चात् परमेश्वर के उस परम पद की खोज करनी चाहिए जहाँ जाने के पश्चात् साधक लौटकर संसार में कभी नहीं आते। जिस परमेश्वर से संसार रूपी वृक्ष की प्रवृति विस्तार को प्राप्त हुई है यानि जिस परमेश्वर ने संसार की रचना की है, केवल उसी की भक्ति करो।

वाणी नं. 24 में यही स्पष्ट किया है कि यदि स्वर्ग जाने की भी तमन्ना है तो वे भी विशेष (निज) मंत्रों के जाप से ही पूर्ण होगी। परंतु यह इच्छा तत्त्वज्ञान के अभाव से है। जैसे गीता अध्याय 2 श्लोक 46 में बहुत सटीक उदाहरण दिया है कि सब ओर से परिपूर्ण जलाश्य (बड़ी झील=स्ंाम) प्राप्त हो जाने पर छोटे जलाशय (तालाब) में मनुष्य का जितना प्रयोजन रह जाता है। उसी प्रकार तत्त्वज्ञान की प्राप्ति के पश्चात् विद्वान पुरूष का वेदों (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद) में प्रयोजन रह जाता है।

भावार्थ:– तत्त्वज्ञान की प्राप्ति के पश्चात् अन्य देवताओं से होने वाले क्षणिक लाभ (स्वर्ग व राज्य प्राप्ति) से अधिक सुख समय तथा पूर्ण मोक्ष (गीता अध्याय 15 श्लोक 4 वाला मोक्ष) जो परमेश्वर (परम अक्षर ब्रह्म=गीता अध्याय 8 श्लोक 3, 8, 9, 10, 20 से 23 वाले परमेश्वर) के जाप से होता है, की जानकारी के पश्चात् साधक की जितनी श्रद्धा अन्य देवताओं में रह जाती है:-

कबीर, एकै साधै सब सधै, सब साधें सब जाय। माली सींचे मूल कूँ, फलै फूलै अघाय।।

भावार्थ:– गीता अध्याय 15 श्लोक 1.4 को इस अमृतवाणी में संक्षिप्त कर बताया है किः-

जो ऊपर को मूल (जड़) वाला तथा नीचे को तीनों गुण (रजगुण ब्रह्मा, सतगुण विष्णु, तमगुण शिव) रूपी शाखा वाला संसार रूपी वृक्ष है:-

कबीर, अक्षर पुरूष एक पेड़ है, निरंजन वाकी डार। तीनों देवा शाखा हैं, पात रूप संसार।।

जैसे पौधे को मूल की ओर से पृथ्वी में रोपण करके मूल की सिंचाई की जाती है तो उस मूल परमात्मा (परम अक्षर ब्रह्म) की पूजा से पौधे की परवरिश होती है। सब तना, डार, शाखाओं तथा पत्तों का विकास होकर पेड़ बन जाता है। छाया, फल तथा लकड़ी सर्व प्राप्त होती है जिसके लिए पौधा लगाया जाता है। यदि पौधे की शाखाओं को मिट्टी में रोपकर जड़ों को ऊपर करके सिंचाई करेंगे तो भक्ति रूपी पौधा नष्ट हो जाएगा। इसी प्रकार एक मूल (परम अक्षर ब्रह्म) रूप परमेश्वर की पूजा करने से सर्व देव विकसित होकर साधक को बिना माँगे फल देते रहेंगे।(जिसका वर्णन गीता अध्याय 3 श्लोक 10 से 15 में भी है) इस प्रकार ज्ञान होने पर साधक का प्रयोजन उसी प्रकार अन्य देवताओं से रह जाता है जैसे झील की प्राप्ति के पश्चात् छोटे जलाशय में रह जाता है। छोटे जलाशय पर आश्रित को ज्ञान होता है कि यदि एक वर्ष बारिश नहीं हुई तो छोटे तालाब का जल समाप्त हो जाएगा। उस पर आश्रित भी संकट में पड़ जाएँगे। झील के विषय में ज्ञान है कि यदि दस वर्ष भी बारिश न हो तो भी जल समाप्त नहीं होता। वह व्यक्ति छोटे जलाशय को छोड़कर तुरंत बड़े जलाशय पर आश्रित हो जाता है। भले ही छोटे जलाशय का जल पीने में झील के जल जैसा ही लाभदायक है, परंतु पर्याप्त व चिर स्थाई नहीं है। इसी प्रकार अन्य देवताओं (रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु जी तथा तमगुण शिव जी) की भक्ति से मिलने वाले स्वर्ग का सुख बुरा नहीं है, परंतु क्षणिक है, पर्याप्त नहीं है। इन देवताओं तथा इनके अतिरिक्त किसी भी देवी-देवता, पित्तर व भूत पूजा करना गीता अध्याय 7 श्लोक 12 से 15, 20 से 23 तथा अध्याय 9 श्लोक 25 में मना किया है। इसलिए भी इनकी भक्ति करना शास्त्र विरूद्ध होने से व्यर्थ है जिसका गीता अध्याय 16 श्लोक 23-24 में प्रमाण है। कहा है कि शास्त्र विधि को त्यागकर मनमाना आचरण करने वालों को न तो सुख प्राप्त होता है, न सिद्धि प्राप्त होती है और न ही परम गति यानि पूर्ण मोक्ष की प्राप्ति होती है अर्थात् व्यर्थ प्रयत्न है। (गीता अध्याय 16 श्लोक 23)

इससे तेरे लिए अर्जुन! कत्र्तव्य यानि जो भक्ति कर्म करने चाहिए और अकत्र्तव्य यानि जो भक्ति कर्म न करने चाहिए, उसके लिए शास्त्र ही प्रमाण हैं यानि शास्त्रों को आधार मानकर निर्णय लेकर शास्त्रों में वर्णित साधना करना योग्य है। (गीता अध्याय 16 श्लोक 24)

सुमरन के अंग की वाणी नं. 38 में कहा है:-

गरीब, ऐसा निर्मल नाम है, निर्मल करै शरीर। और ज्ञान मंडलीक है, चकवै ज्ञान कबीर।।

वाणी नं. 47-50:-

गरीब, नाम बिना क्या होत है, जप तप संयम ध्यान। बाहरि भरमै मानवी, अब अंतर में जान।।47।।
गरीब, उजल हिरंबर भगति है, उजल हिरंबर सेव। उजल हिरंबर नाम है, उजल हिरंबर देव।।48।।
गरीब, निजनाम बिना निपजै नहीं, जपतप करि हैं कोटि। लख चैरासी त्यार है, मूंड मुंडायां घोटि।।49।।
गरीब, नाम सिरोमनि सार है, सोहं सुरति लगाइ। ज्ञान गलीचे बैठिकरि, सुंनि सरोवर न्हाइ।।50।।

वाणी नं. 47 से 50 में भी यही समझाया है कि निज नाम (विशेष मंत्र) बिना अन्य नामों का जाप तथा मनमाना घोर तप जो करते हैं, उनकी साधना व्यर्थ है।

{गीता अध्याय 17 श्लोक 1 से 6 तक में भी यही स्पष्ट किया है:- श्लोक 1 में अर्जुन ने पूछा कि आपने गीता अध्याय 16 श्लोक 23.24 में कहा है कि शास्त्रविधि के विपरित साधना व्यर्थ है। यदि साधक शास्त्रविधि को त्यागकर श्रद्धा से अन्य देवताओं (जिनके विषय में गीता अध्याय 7 श्लोक 12 से 15, 20 से 23, अध्याय 9 श्लोक 23, 25 में वर्णन है) का पूजन करते हैं। उनकी स्थिति सात्विक है या राजसी है या तामसी है?

अध्याय 17 श्लोक 2 से 6 तक गीता ज्ञान दाता ने उत्तर दिया:- मनुष्यों की स्थिति तीन प्रकार की ही होती है। सात्विक वृति के व्यक्ति (तत्त्वज्ञान के अभाव से) देवताओं की भक्ति (पूजा) करते हैं। तामसी व्यक्ति प्रेतों, पित्तरों आदि के जन्त्र-मन्त्र में लगे रहते हैं, जो व्यक्ति शास्त्रविधि को त्यागकर मन कल्पित घोर तप को तपते हैं, वे शरीर में स्थित मुझे, उस परमेश्वर तथा कमलों में विराजमान मुख्य देवताओं को कष्ट देने वाले अज्ञानी हैं। उनको राक्षस स्वभाव के जान।}

वाणी नं. 49:-

गरीब, निज नाम बिना निपजै नहीं, जप तप करहें कोटि।
लख चैरासी तैयार हैं, क्या मूंड मुंडाया घोटि।।49।।

भावार्थ:– वास्तविक नाम (सात नाम, सतनाम तथा सारनाम) बिना भक्ति रूपी फसल नहीं उपजती यानि जैसे गेहूँ की फसल प्राप्त करने के लिए गेहूँ का बीज ही बीजना पड़ता है। यदि ग्वार का बीज बोकर गेहूँ की प्राप्ति की इच्छा लिए है तो भूखा मरेगा। इसलिए कहा है कि वास्तविक नाम के जाप बिना अन्य नामों का जाप तथा मनमाना घोर तप करके आप खुश हुए बैठे हो, कोई सिर के सब बाल तथा दाढ़ी-मूँछ कटाकर सफाचट रहता है, गलत साधना करके मोक्ष की आशा लगाए है, उनसे कहा है कि चैरासी लाख योनियों की प्राप्ति तैयार है।

कबीर, करता था तब क्यों किया, अब करके क्यों पछताए।
बोए पेड़ बबूल का, आम कहाँ से खाय।।

यह सुमरन के अंग का सारांश है।

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