पतिव्रता का अंग (29-33) | प्रहलाद की कथा

वाणी नं. 29-30:-

गरीब, पतिब्रता प्रहलाद है, एैसी पतिब्रता होई। चैरासी कठिन तिरासना, सिर पर बीती लोइ।।29।।
गरीब, राम नाम छांड्या नहीं, अबिगत अगम अगाध। दाव न चुक्या चैपटे, पतिब्रता प्रहलाद।।30।।

भक्त प्रहलाद की कथा

भावार्थ:- भक्त प्रहलाद को उनके पिता हिरण्यकशिपु ने राम नाम छुड़वाने के लिए अनेकों कष्ट दिए, परंतु अपना उद्देश्य नहीं बदला। भक्त प्रहलाद दृढ़ रहा तो परमात्मा ने पल-पल (क्षण-क्षण) रक्षा की।

बिल्ली के बच्चों की रक्षा करना

प्रहलाद को अक्षर ज्ञान तथा भक्ति ज्ञान के लिए उनके पिता राजा हिरण्यकशिपु ने शहर से बाहर बनी पाठशाला में भेजा जहाँ पर दो पाधे (उपाध्य यानि आचार्य) एक साना तथा दूसरा मुर्का पढ़ाया करते थे। धर्म की शिक्षा दिया करते थे। हिरण्यकशिपु के आदेश से सबको हिरण्यकशिपु-हिरण्यकशिपु नाम जाप करने का मंत्र बताते थे। कहते थे कि राम-विष्णु नाम नहीं जपना है या अन्य किसी भी देव का नाम नहीं जपना है। हिरण्यकशिपु (हरणाकुश) ही परमात्मा है। प्रहलाद भी अपने पिता का नाम जाप करते थे। यदि कोई हिरण्यकशिपु के स्थान पर राम-राम या अन्य नाम जो प्रभु के हैं, जाप करता मिल जाता तो उसे मौत की सजा सबके सामने दी जाती थी।

पाठशाला के रास्ते में एक कुम्हार ने मटके पकाने के लिए आवे में रखे थे। लकड़ी तथा उपलों से ढ़क रखा था। सुबह अग्नि लगानी थी। रात्रि में एक बिल्ली ने अपने बच्चे उसी आवे (मटके पकाने का स्थान) में एक मटके में रख दिए। प्रातः काल बिल्ली अन्य घर में भोजन के लिए चली गई। कुम्हार ने आवे को अग्नि लगा दी। आग प्रबल होकर जलने लगी। कुछ समय पश्चात् बिल्ली आई और अपने बच्चे को आपत्ति में देखकर म्याऊँ-म्याऊँ करने लगी। कुम्हारी को समझते देर ना लगी। वह भी परमात्मा से अर्ज करने लगी और रोने लगी। हे प्रभु! हे राम! हमारे को महापाप लगेगा। इस बिल्ली के बच्चों की रक्षा करो। बार-बार यह कहकर पुकार कर रही थी। उस समय भक्त प्रहलाद उसी रास्ते से पाठशाला जा रहा था। कुम्हारी को रोते हुए देखा तो उसके निकट गया। वह हे राम! हे विष्णु भगवान! हे परमेश्वर! इन बिल्ली के बच्चों को बचाओ, हमारे को पाप लगेगा, कह रही थी। प्रहलाद ने उस माई से कहा कि हे माता! आप राम ना कहो। मेरे पिता जी का नाम लो, नहीं तो आपको मार डालेगा। कुम्हारी ने बताया कि इस आवे में बिल्ली के बच्चे रह गए हैं। हमारे को पता नहीं चला। भगवान से इन बच्चों की सुरक्षा के लिए प्रार्थना कर रही हूँ। इस भयंकर अग्नि से राजा हिरण्यकशिपु नहीं बचा सकते, परमात्मा ही बचा सकते हैं। प्रहलाद भक्त ने कहा, माई! जब आप घड़े निकालें तो मुझे बुलाना। ऐसी शीतल हवा चली कि अग्नि बुझ गई। कहते हैं कि एक महीने में आवे में रखे घड़े पकते थे। उस समय 2) (अढ़ाई) दिन में आवा पक गया। प्रहलाद भक्त को बुलाकर आवे से मटके निकाले गए। जिस घड़े में बिल्ली के बच्चे थे, वह घड़ा कच्चा था। बिल्ली के बच्चे सुरक्षित थे। अन्य सब घड़े पके हुए थे। यह दृश्य देखकर प्रहलाद ने मान लिया कि ऐसी विकट परिस्थिति में मानव कुछ नहीं कर सकता। परमात्मा ही समर्थ हैं।

कुम्हारी से भक्त प्रहलाद जी ने कहा था कि माता जी! यदि भगवान ने बिल्ली के बच्चे बचा दिए तो मैं भी परमात्मा का ही नाम जपा करूँगा। अपने पिता का नाम जाप नहीं करूँगा। उस दिन के पश्चात् प्रहलाद भक्त राम का नाम जाप करने लगा। यह घटना सत्ययुग की है। श्री रामचन्द्र पुत्रा दशरथ जी का तो जन्म भी नहीं हुआ था। जब साना तथा मुर्का अध्यापकों को पता चला कि प्रहलाद राम का जाप करता है तो उसे बहुत समझाया कि आप हिरण्यकशिपु राजा का नाम जाप करो।

प्रहलाद ने कहा कि गुरूदेव! मेरे पिता मानव हैं, राजा हैं, परंतु भगवान नहीं हैं। विशेष परिस्थिति में परमात्मा ही रक्षा कर सकता है। जीव कल्याण भी परमात्मा से हो सकता है। राजा जनता को क्या देता है? उल्टा ‘‘कर’’ (ज्ंग) जनता से लेता है। परमात्मा सबका पालन करता है। वर्षा करता है तो धन्य-धान्य से मानव परिपूर्ण होता है। राजा होना अनिवार्य है, परंतु अन्यायी नहीं होना चाहिए। राजा कानून व्यवस्था बनाने के लिए बनाया जाता है। प्रजा की बदमाशों से सुरक्षा करना राजा का परम कत्र्तव्य है। राजा को परमात्मा की भक्ति से ही राज्य प्राप्त होता है। राजा यदि प्रजा को तंग करता है तो परमात्मा उसे दण्ड देता है। नरक में डालता है। फिर पशु-पक्षियों की योनियों में कष्ट उठाता है। इसलिए राजा को भी परमात्मा का नाम लेना चाहिए। परमात्मा से डरकर काम करना चाहिए। साना ने कहा, राजकुमार! आप हमारे शिष्य हैं, गुरू नहीं। आप हमें शिक्षा दे रहे हो। प्रहलाद ने कहा, क्षमा करो गुरूदेव! मैं आपको शिक्षा नहीं दे रहा, राजा का धर्म बता रहा हूँ। मुर्का पाण्डे ने कहा, हे राजकुमार! यह ज्ञान आपको किसने करवाया? प्रहलाद ने कहा, गुरूदेव! मुझे पिछली याद ताजा हो गई है। जब मैं माता के गर्भ में था। नारद जी मेरे पास आए थे (सूक्ष्म रूप बनाकर) उन्होंने मुझे परमात्मा की महिमा तथा मानव कत्र्तव्य बताया था। मुझे नाम भी जाप करने को दिया था। अब मैं वही जाप किया करूँगा।

साना-मुर्का पंडितों ने राजा को बताया कि आपका पुत्रा राम का नाम जाप करता है। हमारी बात नहीं मानता। हम शिक्षा देते हैं तो हमारे को ही ज्ञान सुनाने लगता है। हिरण्यकशिपु ने बुलाकर राम का नाम न जपने को कहा तो प्रहलाद ने स्पष्ट कहा, पिताजी! परमात्मा ही समर्थ है। प्रत्येक कष्ट से परमात्मा ही बचा सकता है। मानव समर्थ नहीं है। यदि कोई भक्त साधना करके कुछ शक्ति परमात्मा से प्राप्त कर लेता है तो वह सामान्य व्यक्तियों में तो उत्तम हो जाता है, परंतु परमात्मा से उत्तम नहीं हो सकता। परमात्मा ही श्रेष्ठ है। वही समर्थ है।

यह बात भक्त प्रहलाद से सुनकर अहंकारी हिरण्यकशिपु क्रोध से लाल हो गया और नौकरों-सिपाहियों से बोला कि इसको ले जाओ मेरी आँखों के सामने से और जंगल में सर्पों में डाल आओ। सर्प के डसने से यह मर जाएगा। ऐसा ही किया गया। परंतु प्रहलाद मरा नहीं, सर्पों ने डसा नहीं। आराम से सो रहा था। सुबह धूप से बचाने के लिए सर्प प्रहलाद भक्त पर अपने फन फैलाकर छाया किए हुए थे। राजा ने कहा कि जाओ, जंगल से शव उठा लाओ। सिपाही गए तो प्रहलाद सुरक्षित था। सर्प इधर-उधर चले गए। सिपाहियों ने सब देख लिया था। प्रहलाद को मरा जान उठाने लगे तो प्रहलाद अपने आप उठ खड़ा हुआ। प्रहलाद की आयु दस वर्ष थी। फिर पर्वत से फैंकवाया। प्रहलाद फूलों के घने पौधों के ऊपर गिरा, मरा नहीं।

फिर प्रहलाद की बूआ होलिका अपने भाई हिरण्यकशिपु की आज्ञा से चिता के ऊपर प्रहलाद जी को गोद में (गोडों में) लेकर बैठ गई। होलिका के पास एक चद्दर थी। उसको ओढ़कर यदि अग्नि में प्रवेश कर जाए तो जलता नहीं था। उस चद्दर को ओढ़कर अपने को पूरा ढ़ककर प्रहलाद को उससे बाहर गोडों में बैठा लिया। कहा, बेटा! देख मैं भी तो बैठी हूँ। कुछ नहीं होगा तेरे को। अग्नि लगा दी गई। परमात्मा ने शीतल पवन चलाई। तेज आँधी आई। होलिका के शरीर से चद्दर उड़कर प्रहलाद भक्त को पूरा ढ़क लिया। होलिका जलकर राख हो गई। भक्त को आँच नहीं आई। प्रहलाद जी का विश्वास बढ़ता चला गया। ऐसे-ऐसे चैरासी कष्ट भक्त को दिए गए, परंतु परमात्मा ने भक्त के विश्वास को देखकर उसकी दृढ़ता से प्रसन्न होकर उसके पतिव्रत धर्म से प्रभावित होकर प्रत्येक संकट में
सहायता की।

हिरण्यकशिपु ने श्री ब्रह्मा जी की भक्ति करके वरदान प्राप्त कर रखा था कि मैं सुबह मरूँ ना शाम मरूँ, दिन में मरूँ न रात्रि में मरूँ, बारह महीने में से किसी में ना मरूँ, न अस्त्रा-शस्त्रा से मरूँ, पृथ्वी पर मरूँ ना आकाश में मरूँ। न पशु से मरूँ, ना पक्षी, ना कीट से मरूँ, न मानव से मरूँ। न घर में मरूँ, न बाहर मरूँ। हिरण्यकशिपु ने प्रहलाद को मारने के लिए एक लोहे का खम्बा अग्नि से गर्म करके तथा तपाकर लाल कर दिया। प्रहलाद जी को उस खम्बे (च्पससंत) के पास खड़ा करके हिरण्यकशिपु ने कहा कि क्या तेरा प्रभु इस तपते खम्बे से भी इससे तेरी जलने से रक्षा कर देगा? हजारों दर्शक यह अत्याचार देख रहे थे। प्रहलाद भक्त भयभीत हो गए कि परमात्मा इस जलते खम्बे में कैसे आएगा? उसी समय प्रहलाद ने देखा कि उस खम्बे पर बालु कीड़ी (भूरे रंग की छोटी-छोटी चींटियाँ) पंक्ति बनाकर चल रही थी। ऊपर-नीचे आ-जा रही थी। प्रहलाद ने विचार किया कि जब चीटियाँ नहीं जल रही तो मैं भी नहीं जलूँगा। हिरण्यकशिपु ने कहा, प्रहलाद! इस खम्बे को दोनों
हाथों से पकड़कर लिपट, देखूँ तेरा भगवान तेरी कैसे रक्षा करता है? यदि खम्बा नहीं पकड़ा तो देख यह तलवार, इससे तेरी गर्दन काट दूँगा। डर के कारण प्रहलाद जी ने परमात्मा का नाम स्मरण करके खम्बे को पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाए।

उसी के अंदर से नरसिंह रूप धारण करके प्रभु प्रकट हुए। हिरण्यकशिपु भयभीत होकर भागने लगा। नरसिंह प्रभु ने उसे पकड़कर अपने गोडों (घुटनों) के पास हवा में लटका दिया।

हिरण्यकशिुप चीखने लगा कि मुझे क्षमा कर दो, मैं कभी किसी को नहीं सताऊँगा। तब प्रभु ने कहा, क्या मेरे भक्त ने तेरे से क्षमा याचना नहीं की थी? तूने एक नहीं सुनी। अब तेरी जान पर पड़ी तो डर लग रहा है। हे अपराधी! देख न मैं मानव हूँ, न पशु, न आकाश है, न पृथ्वी पर, न सुबह है न शाम है। न बारह महीने, यह तेरहवां महीना है, (हरियाणा की भाषा में लौंद का महीना कहते हैं) न अस्त्रा ले रखा है, न शस्त्रा मेरे पास है। घर के दरवाजे (gate) के मध्यम में खड़े थे। न घर में, न बाहर हूँ। अब तेरा अंत है। यह कहकर नरसिंह भगवान ने उस राक्षस का पेट फाड़कर आँतें निकाल दी और जमीन पर उस राक्षस को फैंक दिया। प्रहलाद को गोदी में उठाया और जीभ से चाटा (प्यार किया)। उस नगरी का राजा प्रहलाद बना। विवाह हुआ। एक पुत्रा हुआ जिसका नाम बैलोचन (विरेचन) रखा। उस बैलोचन का पुत्रा राजा बली हुआ जिसने अश्वमेघ यज्ञ की थी जिसमें परमात्मा बावन (बौना) रूप बनाकर एक ब्राह्मण के रूप में आए और तीन पैड़ (कदम) जमीन दान में माँगी थी। भगवान ने एक कदम (डंग) में पूरी पृथ्वी नापी तथा दूसरे पग में स्वर्ग, तीसरे के लिए स्थान माँगा तो बली ने कहा कि यह मेरी पीठ पर रखो, यह कहकर पृथ्वी पर मुख के बल लेट गया। तब प्रभु ने खुश होकर कहा कि माँग! क्या माँगता है? बली ने कहा कि मैंने इन्द्र के राज्य के लिए सौवीं (100वीं) यज्ञ की है। भगवान बोले, इस इन्द्र को अपना शासनकाल पूरा करने दो, फिर आपको इन्द्रासन देंगे। आप मेरी शर्त पूरी नहीं कर पाए। इसलिए अभी इन्द्र को पद से नहीं हटा सकते। फिर भी आपने मेरे को सर्वस्व दे दिया। इसलिए इसके पश्चात् तेरे को इन्द्रासन दिया जाएगा। तब तक तेरे को पाताल लोक का राजा बनाता हूँ। वहाँ राज्य करो। मैंने इन्द्र से उसका राज्य बनाए रखने का वचन दिया है। बली ने कहा कि एक मेरी शर्त है, उसके लिए वचन दें। भगवान ने कहा कि बोलो। बली ने कहा कि जब तक मैं पाताल में रहूँ तो आप इसी बावन (बौना-ठिगना) रूप में मेरे द्वार के आगे खड़े रहोगे। भगवान विष्णु ने कहा तथास्तु (ऐसा ही होगा)। भक्त प्रहलाद के पोते राजा बली को पाताल का राज्य प्रदान किया। भक्त प्रहलाद जी अपने धर्म-कर्म पर डटे रहे यानि पतिव्रता धर्म का पालन करके अटल रहे तो परमात्मा ने सहायता की। जब तक सूरज चाँद रहेगा, महापुरूषों का नाम रोशन रहेगा। (29-30)

वाणी नं. 31:-

गरीब, पतिब्रता ध्रुव जानिये, और पतिब्रता कौन। उत्तानपाद का राज सब, छाड्या सकल अलौन।।31।।

सरलार्थ:– भक्त ध्रुव जी ने पतिव्रता धर्म का पालन किया। अपने पिता के राज्य को त्यागकर ठान ली कि परमात्मा देगा, तब ही राज्य लूँगा। जिस कारण से परमात्मा की भक्ति की। टस से मस नहीं हुआ। बाद में उतानपात जी ने धु्रव जी को कह दिया था कि बेटा! मैं सर्व राज्य तुझे दे दूँगा, आप घर त्यागकर मत जाओ, परंतु धु्रव जी ने परमात्मा को महत्व दिया। (31)

कथा सुमरण के अंग में वाणी नं. 103 के सरलार्थ में लिखी है।

वाणी नं. 32-33:-

गरीब, सोला सहंस सुहेलियां, छाडे़ मीर दिवान। बलख बुखारा तजि गये, देख अधम सुलतान।।32।।
गरीब, सुलतानी पतिब्रत है, छाड्या बलख बुखार। मन मंजन अबिगत रते, सांई का दीदार।।33।।

सरलार्थ:– अब्राहिम सुल्तान अधम को जब परमेश्वर का ज्ञान हुआ तो परमात्मा पति के लिए समृद्ध राज्य त्याग दिया। सोलह हजार स्त्रिायाँ, अठारह लाख घोड़े-घोड़ी, अन्य धन को त्यागकर परमात्मा के लिए बेघर हो गए। फिर कभी राज्य की इच्छा मन में नहीं आई। भूख-प्यास, गर्मी-सर्दी को सहन किया, परंतु परमात्मा पति के मार्ग पर डटे रहे। पतिव्रता धर्म का पालन किया, मोक्ष पाया।