parakh-ka-ang-150-184

पारख का अंग (150-184) |दुर्वासा तथा अंबरीष की कथा

वाणी नं. 150-184:-

गरीब, दुर्बासा काली शिला, बज्र बली तिहूं लोक। अम्बरीष दरबार में, तिन्ह भी खाया धोख।।150।।
गरीब, चक्र सुदर्शन शीश परि, अम्बरीष कूं घालि। तीन लोक भागे फिरे, ऐसी अबिगत चाल।।151।।
गरीब, कल्प किसी नहीं कीजिये, जो चाहे सो होय। दुर्बासा के छिपन कूं, कहीं न पाई खोहि।।152।।
गरीब, स्वर्ग मृत पाताल में, चक्र सुदर्शन डीक। दुर्बासा के चक्र सैं, जरे नहीं अम्बरीष।।153।।
गरीब, चक्र अपूठा फिर गया, चरण कंवल कूं छूहि। भक्ति बिश्वंभर नाथ की, देखि दूह बर दूह।।154।।
गरीब, कोटि बज्र कूं फूक दे, चक्र सुदर्शन चूर। भक्ति बछल भगवान सैं, रहै पैंड दस दूर।।155।।
गरीब, दुर्बासा के दहन कूं, रती न जग में भेट। छप्पन कोटि जादौं गये, देखि हेठ दर हेठ।।156।।
गरीब, साग पत्र सें छिक गये, देखि भक्ति की रीति। जरै मरै नहीं तास तैं, सतगुरु शब्द अतीत।।157।।
गरीब, अम्बरीष असलां असल, भक्ति मुक्ति का रूप। निश बासर पद में रहै, जहां छाया नहीं धूप।।158।।
गरीब, राजा कै जोगी गये, दुर्बासा ऋषि देव। चक्र चलाया घूरि करि, नहीं लई ऋषि सेव।।159।।
गरीब, दुर्बासा के शीश कूं, चाल्या चक्र अचान। त्रिलोकी में तास गमि, कहीं न देऊं जान।।160।।
गरीब, सेत लोक बिष्णु पुरी, दुर्बासा चलि जाय। तहां कबीर विष्णु रूप धारि, कीन्हीं देखि सहाय।।161।।
गरीब, कृष्ण गुरू कसनी हुई, और बचैगा कौन। तीन लोक भागे फिरे, भरमें चैदह भौन।।162।।
गरीब, भक्ति द्रोह न कीजिये, भक्ति द्रोह मम दोष। शिब ब्रह्मा नारद मुनी, जिन्है जरावैं ठोक।।163।।
गरीब, भक्ति द्रोह रावण किया, हिरनाकुश हिरनाछ। नारायण नरसिंह भये, मम भगता है साच।।164।।
गरीब, मम भगता मम रूप है, मम भगता मम प्राण। पंड सताये कौरवां, दुर्योधन छ्यो मान।।165।।
गरीब, मम भगता मम प्राण है, मम भगता मम देह। हिरनाकुश के उदर कूं, पारत नहीं संदेह।।166।।
गरीब, मम भगता मम प्रिय है, नहीं दुनी सें काम। राजा परजा रीति सब, यह नहीं जानैं राम।।167।।
गरीब, मम भगता कै कारनै, रचे सकल भंडार। बाल्मीक ब्रह्म लोक में, संख कला उदगार।।168।।
गरीब, रावण बाली बिहंडिया, मम द्रोही मम जार। सीता सती कलंक क्या, पदम अठारा भार।।169।।
गरीब, मम द्रोही सें ना बचूं, छलि बल हनूं प्राण। बावन हो बलि कै गये, रह्या दोहूं का मान।।170।।
गरीब, मम द्रोही मम साल है, मेरे जन का दूत। कोटि जुगन काटौं तिसैं, करूं जंगल का भूत।।171।।
गरीब, खान पान पावै नहीं, जल तिरषा बोह अंत। बस्ती में बिचरैं नहीं, शूल फील गज दंत।।172।।
गरीब, मम द्रोही मम साल है, मारौं रज रज बीन। भवन सकल अरु लोक सब, करौं प्राण तिस क्षीण।।173।।
गरीब, अर्ध मुखी गर्भ बास में, हरदम बारमबार। जुनि पिशाची तास कूं, जब लग सष्टि संघार।।174।।
गरीब, गर्भ जुनि में त्रास द्यौं, जब लग धरणि अकाश। मारौं तुस तुस बीन करि, नहीं मिटै गर्भबास।।175।।
गरीब, प्राण निकंदू तास कै, छ्यासी सष्टि सिंजोग। संत संतावन कल्प युग, ता शिर दीर्घ रोग।।176।।
गरीब, बिष्णु ब्रह्मा शिब सुनौं, और सनकादिक च्यारि। अठासी सहंस जलेब में, याह मति मूढ गंवार।।177।।
गरीब, चक्र चले दुर्बासा परि, में बखशौं नहीं तोहि। मम द्रोही तूं दूसरा, चरण कंवल ऋषि जोहि।।178।।
गरीब, दुर्बासा बोले तहां, सुनौ भक्ति के ईश। स्वर्ग रिसातल लोक सब, तूं पूरण जगदीश।।179।।
गरीब, तुह्मरे दर छूटे नहीं, चक्र सुदर्शन चोट। कहां खंदाओ ईश जी, बचैं कौन की ओट।।180।।
गरीब, अम्बरीष दरबार में, जाओ निर संदेह। काल घटा पूठी पडै, मम द्रोही मुख खेह।।181।।
गरीब, दुर्बासा मतलोक कूं, तुम जाओ ततकाल। ज्ञान ध्यान शास्त्रार्थ तजो, बाद बिद्या जंजाल।।182।।
गरीब, जप तप करनी काल है, बिना भक्ति बंधान। एक ही केवल नाम है, सो देवैंगे दान।।183।।
गरीब, मान बड़ाई कूकरी, डिंभ डफान करंत। जिन कै उर में ना बसौं, जम छाती तोरंत।।184।।

सारांश:– सत्ययुग में अंबरीष नाम के एक धार्मिक राजा हुए हैं। वही आत्मा त्रेतायुग में राजा जनक हुए जो सीता जी के पिता थे। वही राजा अंबरीष व राजा जनक वाली आत्मा कलयुग में श्री नानक देव (सिख धर्म प्रर्वतक) हुए। राजा अंबरीष के ईष्ट देव श्री विष्णु जी थे। किसी गुरू जी से दीक्षा लेकर साधना करते थे। राजा अंबरीष भक्ति को प्राथमिकता देते थे। उसके लिए अन्न-जल का संयम रखते थे कि मन भक्ति में लगे। भक्त अंबरीष ने महीने के आहार का नियम बना रखा था। वे प्रतिदिन एक रोटी कम खाते थे। उस समय मानव शरीर लंबा-चैड़ा होता था। मानव की लंबाई सौ फुट के आसपास होती थी। इसके अनुसार मोटाई भी अधिक होती थी। भोजन की खुराक (क्पमज) भी अधिक होती थी। गुरू जी ने एकादशी (ग्यारस) का व्रत रखना भी भक्ति कर्म बता रखा था। अंबरीस को वेद ज्ञान भी था। उनकी आत्मा मानती थी कि व्रत रखना वेद में नहीं लिखा है। गुरू को भी नाराज नहीं करना चाहा। इसलिए अपने आहार को इस प्रकार नियमित किया कि एकादशी को भोजन न करना पड़े। जैसे एक दिन में पेट भरने के लिए सामान्य तौर पर ग्यारह रोटी भोजन करते थे तो उसको प्रतिदिन इस तरह कम करते थे कि एकादशी को बिल्कुल न खाना पड़े। जैसे कृष्ण पक्ष की अमावस्या को रोटी व अन्य सब्जी खाते थे तो प्रतिदिन एक रोटी व उसी अनुसार सब्जी भी कम कर देते थे।

तो एकादशी को कुछ नहीं खाते थे। फिर इसी तरह प्रतिदिन एक-एक रोटी बढ़ाते थे। यह प्रति महीने का क्रम था।

एक बार एकादशी को ऋषि दुर्वासा जी, राजा अंबरीष जी के दरबार में आए। राजा ने ऋषि जी का आदर-सत्कार किया। भोजन के लिए निवेदन किया। ऋषि दुर्वासा ने कहा कि भोजन तैयार करवाओ। तब तक मैं दरिया पर स्नान करके आता हूँ। ऋषि जी को लौटने में देरी हो गई। राजा अंबरीष के गुरूजी ने राजा को व्रत समापन करने को कहा। अंबरीष ने विचार किया कि ऋषि दुर्वासा के आने पर ही जल आचमन करूँगा। परंतु ऋषि नहीं आए। गुरू जी ने एकादशी समाप्त होने से पहले जल का आचमन अंबरीष को करवा दिया। ऋषि दुर्वासा लौटे तो अंबरीष से कहा कि आप भी हमारे साथ बैठकर खाना खाओ। अंबरीष ने सब बात बताई कि आज मेरा एकादशी का व्रत था। एकादशी आज के दिन ग्यारह बजे समाप्त हो गई है। इससे पहले एकादशी के व्रत को समापन करना अनिवार्य था। मैंने जो खाना था, खा लिया। अब आज कुछ नहीं खाना है। ऋषि दुर्वासा तो क्रोध से भरे रहते थे। अंबरीष से कहा कि तेरे घर पर ऋषि आए हैं। तूने ऋषियों से पहले भोजन करके हमारा अपमान किया है। यह कहकर ऋषि ने राजा को उपदेश दिया कि यह कर्म-काण्ड वेद विरूद्ध है। इसे नहीं करना चाहिए, व्यर्थ है। राजा ने कहा जो आपकी आज्ञा। ऋषि दुर्वासा बिना आहार किए ही चला गया। अगली बार भी दुर्वासा जान-बूझकर एकादशी को आया। राजा ने उसी तरह एकादशी का व्रत समापन किया। ऋषि जान-बूझकर उस दिन और देर से स्नान करके आए। खाने के समय राजा के साथ बैठकर भोजन करने का आदेश दिया। राजा ने वही विवशता बताई कि मैंने एकादशी के व्रत का समय पर उद्यापन करना पड़ा। आज भोजन नहीं खा सकता, क्षमा करो। आप भोग लगाओ और हमें कृतार्थ करो। यह उत्तर राजा का सुनकर ऋषि दुर्वासा आग-बबूला होकर बोला, मैंने तुझे एकादशी का व्रत न रखने को कहा था। आपने मेरा अपमान किया है। राजा ने कहा कि ऋषि जी! मैं व्रत नहीं रखता। यह तो अन्न-जल का संयम बनाकर साधना करता हूँ। परंतु ऋषि दुर्वासा ने सुदर्शन चक्र को आदेश दिया कि राजा का सिर काट दे। सुदर्शन चक्र तुरंत सक्रिय हुआ। आग की लपटें निकलने लगी। सुदर्शन चक्र ने भयंकर रूप धारण किया और राजा अंबरीष की ओर चला जो वहाँ से दस कदम (लगभग 50-60 फुट) दूरी पर जमीन पर आसन लगाए बैठा था। राजा के चरण छूकर सुदर्शन चक्र वापिस दुर्वासा ऋषि की ओर मुड़ा और ऋषि के शांत करने पर भी शांत नहीं हुआ तो ऋषि को समझते देर न लगी कि चक्र तेरे को भस्म करेगा। अपने प्राणों की रक्षा के लिए पहले अपने ईष्ट देव श्री शिव जी के पास गए। सब बात बताई तथा रक्षा की प्रार्थना की। श्री शिव जी से भी सुदर्शन चक्र शांत नहीं हुआ तो ऋषि से कहा कि भाग! भाग! हमें भी मरवाएगा। ऋषि दुर्वासा श्री ब्रह्मा जी के पास गया। वहाँ से भी भगा दिया और बताया कि विष्णु के पास जा। अंबरीष विष्णु का भक्त है। दुर्वासा को भी पता था। इसलिए वहाँ नहीं जाना चाहता था। परंतु मरता क्या न करता वाली बात सामने थी। ऋषि दुर्वासा सिद्धि से उड़ा जा रहा था। श्री विष्णु के रूप में परमात्मा पूर्ण ब्रह्म तेतीस करोड़ देवाताओं की सभा लगाए हुए थे। परमात्मा को सब पता था कि दुर्वासा विष्णु के पास जाएगा। इसलिए विष्णु के सभा स्थल से दस योजन (एक योजन 4 कोस का, एक कोस 3 किलोमीटर का यानि एक सौ बीस किलोमीटर) दूर लीला करने के लिए सभा लगाए हुए थे। परमात्मा भक्त की महिमा बनाते हैं। ऋषि दुर्वासा कभी पीछे मुड़कर सुदर्शन चक्र की ओर देख रहा था कि कितना दूर पीछे है तो कभी आगे को देखकर उड़ा जा रहा था। परमात्मा के दरबार में पृथ्वी पर चलकर दौड़कर गया। तब परमात्मा ने पूछा कि ऋषि जी! कैसे स्पीड खींच रखी है। यह सुदर्शन चक्र तेरे पीछे-पीछे किस कारण से लगा हैं?

(सुकर्मी पतिब्रता के अंग की वाणी से)

वाणी नं. 95:-

गरीब बूझे विसंभर नाथ चक्र क्यों चोट चलाई। क्या गुस्ताकी कीन्हीं कथा मोहे बेग सुनाई।।

अर्थात् परमात्मा ने विष्णु रूप में ऋषि दुर्वासा से पूछा कि सुदर्शन चक्र ने आप के ऊपर आक्रमण किस कारण से किया? शीघ्र बताओ। क्या गुस्ताखी (शरारत) की है?

दुर्वासा ने बताया:- वाणी नं. 96-100:-

गरीब, अंबरीस मत लोक, बसे एक राजा सूचा। करै एकादस ब्रत, ज्ञान कछु अधिका ऊंचा।।96।।
गरीब, हम कीन्हा ब्रह्मज्ञान, ऊन्हैं सिरगुण उपदेसा। छांड एकादस बरत, कह्या हम लग्या अंदेसा।।97।।
गरीब, हम दीना चक्र चलाई, काटि सिर इसका लीजै। औह चक्र पग छूहि, उलट करि दिगबिजै किजै।।98।।
गरीब, हम भागे भय खाइ, चक्र छूटे गैंनारा। तीन लोक में गवन किये, राखे नहिं किन्हैं अधारा।।99।।
गरीब, अब आये तुम पास, जानराइ जानत सोई। हम कूं ल्यौ छिपाइ, चक्र मारे नहिं मोहि।।100।।

सारांश:– मृत लोक (पृथ्वी) के ऊपर अंबरीष नाम का एक सच्चा-सुच्चा राजा निवास करता है। वह एकादशी का व्रत करता है, परंतु उसका ज्ञान उत्तम है। (96)

मैंने उनको ज्ञान समझाया और कहा कि आप एकादशी का व्रत त्याग दो। परंतु राजा अपनी बात को ऊपर रखते हुए अपना ज्ञान बोलने लगा। इससे मुझे क्रोध आ गया। (97)

मैंने सुदर्शन चक्र को आज्ञा दी कि राजा अंबरीष का सिर काट दे। सुदर्शन चक्र चला और राजा के चरण छूकर उल्टा मेरे को मारने के लिए चल पड़ा। (98)

मैं डरकर भागा। तीनों लोकांे में रक्षा के लिए गया, परंतु किसी ने शरण नहीं दी। (99)

हे जानी जान! अब मैं आपकी शरण में आया हूँ। मेरे को छुपा लो। सुदर्शन चक्र मुझे मारे ना, मेरी रक्षा करो। (100)

वाणी नं. 101-103, 107, 111-115:

गरीब, हंसे विसंभर नाथ, ऋषिन तूं ज्ञानहि हीना। अंबरीस दरबार तुम्हों, क्यूं दिगबिजै कीना।।101।।
गरीब, अंबरीस रनधीर, सती सूरा सतबादी। तुम दुर्बासा देव, फिरौ ज्ञानन के बादी।।102।।
गरीब, निरगुण सिरगुण भगति, सबै उनके हैं देवा। उर में रहै छिपाइ, कहै कौनन सें भेवा।।103।।
गरीब, तुम ऋषि जावो बेगि, अंबरीस दरबारा। दुंदबाद मिटि जांहि, होत तुम्हरा निस्तारा।।107।।
गरीब, चरन कमल चित्त लाइ, पड़ौं उनके दरबारा। वे कल्पवक्ष सरूप, कष्ट के मोचन हारा।।111।।
गरीब, जब ऋषि चलै बिचारि, चूक हमरी ही निकसी। चक्र सुदर्शन गैल, जान अंबरीषहि बकसी।।112।।
गरीब, बोले राजा बैंन, सुनो दुर्बासा देवा। ना कछु हमरे दोष, तुम्हारा तुमको लेवा।।113।।
गरीब, राजा द्यौह आसीस, पीठ पर हाथ लगावौ। चक्र सुदर्शन पकड़ि, धरो मेरे मस्तक लावौ।।114।।
गरीब, अंबरीष कूं चक्र, पकड़ि सीतल चक्र कीना। जब ऋषि दई असीस, सही राजा प्रबीना।।115।

पारख के अंग से वाणी:-

वाणी नं. 150-155 तथा 161, तथा 179-184, 188-192:-

गरीब, दुर्बासा काली शिला, बज्र बली तिहूं लोक। अम्बरीष दरबार में, तिन्ह भी खाया धोख।।150।।
गरीब, चक्र सुदर्शन शीश परि, अम्बरीष कूं घालि। तीन लोक भागे फिरे, ऐसी अबिगत चाल।।151।।
गरीब, कल्प किसी नहीं कीजिये, जो चाहे सो होय। दुर्बासा के छिपन कूं, कहीं न पाई खोहि।।152।।
गरीब, स्वर्ग मृत पाताल में, चक्र सुदर्शन डीक। दुर्बासा के चक्र सैं, जरे नहीं अम्बरीष।।153।।
गरीब, चक्र अपूठा फिर गया, चरण कंवल कूं छूहि। भक्ति बिश्वंभर नाथ की, देखि दूह बर दूह।।154।।
गरीब, कोटि बज्र कूं फूक दे, चक्र सुदर्शन चूर। भक्ति बछल भगवान सैं, रहै पैंड दस दूर।।155।।
गरीब, श्वेत लोक बिष्णु पुरी, दुर्बासा चलि जाय। तहां कबीर विष्णु रूप धारि, कीन्हीं देखि सहाय।।161।।
गरीब, दुर्बासा बोले तहां, सुनौ भक्ति के ईश। स्वर्ग रिसातल लोक सब, तूं पूरण जगदीश।।179।।
गरीब, तुह्मरे दर छूटे नहीं, चक्र सुदर्शन चोट। कहां खंदाओ ईश जी, बचैं कौन की ओट।।180।।
गरीब, अम्बरीष दरबार में, जाओ निर संदेह। काल घटा पूठी पडै, मम द्रोही मुख खेह।।181।।
गरीब, दुर्बासा मतलोक कूं, तुम जाओ ततकाल। ज्ञान ध्यान शास्त्रार्थ तजो, बाद बिद्या जंजाल।। ृ 182।।
गरीब, जप तप करनी काल है, बिना भक्ति बंधान। एक ही केवल नाम है, सो देवैंगे दान।।183।।
गरीब, मान बड़ाई कूकरी, डिंभ डफान करंत। जिन कै उर में ना बसौं, जम छाती तोरंत।।184।।
गरीब, दुर्बासा अम्बरीष कै, गये ज्ञान गुण डार। चरण कंवल शिक्षा लई, तुम ईश्वर प्राण उधार।।188।।
गरीब, बखशो प्राण दया करो, पीठ लगाओ हाथ। उर मेरे में ठंडि होय, शीतल कीजै गात।।189।।
गरीब, अम्बरीष महके तहां, बिहंसे बदन खुलास। तुम रिषि मेरे प्राण हो, मैं हूं तुमरा दास।।190।।
गरीब, चक्र सुदर्शन शीश धरि, दिजो भगति की आन। मैं चेरा चरणां रहूं, बखशो मेरे प्राण।।191।।
गरीब, चक्र सुदर्शन पकरि करि, अम्बरीष बैठाय। दुर्बासा पर मेहर करि, चलो भक्ति कै भाय।।192।।

अचला के अंग से वाणी:-

वाणी नं. 130-134:-

गरीब, दुर्बासा कैसैं बचैं, अंबरीष के चोर। परमेश्वर बिच कर परे, चक्र सुदर्शन जोर।।130।।
गरीब, जोरा देख्या चक्रका, जब ऊठे जगदीश। खंड खंड करि नाखि है, तोर बगावैं शीश।।131।।
गरीब, भक्ति द्रोह काहे किया, रे शठ मूढ गंवार। चरण कमल तुम धो पीवौ, अंबरीष दरबार।।132।।
गरीब, दुर्बासा पूठे फिरे, जाय किया प्रणाम। अंबरीष स्थिर किये, चरण कमल का ध्यान।।133।।
गरीब, जय जय जय अंबरीष तूं, जय जय भक्ति विशेष। तीन लोक की मांड में, रखी हमारी टेक।।134।।

सुकर्मी पतिब्रता के अंग का सारांश:-

दुर्वासा के ये वचन सुनकर परमात्मा जी हँसने लगे और बोले कि ऋषि! तू ज्ञानहीन है। अंबरीष के दरबार में झगड़ा क्यों किया? अंबरीष राजा तो पूर्ण रूप से मेरे में समर्पित है। सत्य वक्ता है। हे दुर्वासा! तुम तो ज्ञान के वाद-विवाद करने वाले महिमा के भूखे फिर रहे हो। (101-102)

अंबरीष को निरगुण तथा सरगुण दोनों प्रकार की साधना का ज्ञान है। हे ऋषि देव! वे उस सर्व ज्ञान को अपने (उर) हृदय में छिपाऐ हुए है। कोई जानना चाहता नहीं तो किसको भेद बताएँ? (103)

हे ऋषि! तुम शीघ्र अंबरीष के दरबार में जाओ। तुम्हारा सब अज्ञान अंधेरा समाप्त हो जाएगा। तुम्हारा कल्याण हो जाएगा। (107)

हे ऋषि दुर्वासा! तुम अंबरीष के दरबार में जाकर उनके चरणों में गिरो। वे संकट के मोचन करने वाले हैं। (111)

अचला के अंग की वाणी का सारांश:-

संत गरीबदास जी बता रहे हैं कि दुर्वासा कैसे बच सकता था? वह तो एक महान आत्मा अंबरीष का चोर था यानि अंबरीष के यथार्थ ज्ञान को सुनकर भी अपने अहंकार का प्रदर्शन किया। वह तो परमेश्वर जी बीच में आ गए, अन्यथा सुदर्शन चक्र तो बहुत शक्तिशाली है। (130)

परमेश्वर जी ने सुदर्शन चक्र की उग्रता देखी। तब अपना आसन छोड़कर दुर्वासा की रक्षा के लिए उठे। विचार किया कि यदि बचाव नहीं किया तो ऋषि के टुकड़े-टुकड़े करके मार डालेगा। (131)

हे मूर्ख गंवार ऋषि दुर्वासा! तुमने भक्त अंबरीष के साथ द्रोह क्यों किया? तुम अंबरीष के दरबार में जाओ और चरण धोकर पीओ। (132)

पारख के अंग की वाणी का सारांश:-

दुर्वासा ऋषि ने भगवान से कहा कि आप तीनों लोकों के स्वामी हो, आप पूर्ण जगदीश हो। आप भक्तों के भगवान हो। (179)

आपके (दर) द्वार पर मेरी रक्षा नहीं हुई तो कहाँ होगी? आप अपने से दूर कहाँ (खंदाओ) भेज रहे हो? प्रभु जी! सुदर्शन की मार से आपके बिना किसकी (ओट) शरण में बचाव होगा? (180)

परमात्मा ने ऋषि दुर्वासा से कहा कि तुम अंबरीष के दरबार में निःसंकोच जाओ, डरो मत। मेरे भक्त के द्रोही का (मुख खेह) मुख तो काला होता ही है। उस भक्त द्रोही के मुख में (खेह) राख यानि कालिख पड़ती है यानि उसकी तो दुर्गति होती ही है। (181)

परमेश्वर जी ने कहा हे दुर्वासा! तुम मृत लोक यानि पृथ्वी लोक को शीघ्र जाओ। इस शास्त्रार्थ के चक्र को त्याग दे। वाद-विवाद तो जी का जंजाल (झंझट) होता है। (182)

बिना मर्यादा (बंधान) की भक्ति के तो जप-तप अन्य (करनी) क्रियाएँ काल हैं यानि जीवननाशक हैं। सच्चा गुरू तो केवल नाम जाप की दीक्षा देता है। (183)

मैं उनके साथ नहीं रहता जो (डिंभ) पाखण्ड करते हैं। मान-बड़ाई की चाह रखते हैं। मान-बड़ाई तो (कुकरी) कुतिया के समान है यानि बिना इज्जत का कार्य है। परमात्मा के दरबार में इज्जत ना रही तो वह आत्मा गली की कुतिया के समान है। जो पांखड करते हैं, अन्य को नीचा दिखाते हैं, उनकी यम के दूत छाती तोड़ते हैं यानि बुरी मार मारते हैं। (184)

दुर्वासा ऋषि लौटकर राजा अंबरीष के दरबार (राज भवन) में गया। मरता क्या न करता? अपने ज्ञान को त्यागकर अपनी गलती मानकर कहा कि आप तो मेरे ईश्वर हो। मेरे प्राण आधार हो। दया करो। मेरे प्राणों की रक्षा करो। मेरी पीठ पर कृपा भरा हाथ रखो ताकि मेरा दिल शांत हो, (कलेजे को ठंड पडे़) मेरा भय समाप्त हो। सुदर्शन चक्र को मेरे सिर पर शांत करके रखो। मैं आपका (चेरा) नौकर बनकर आपके चरणों में सदा रहूँगा। मेरे जीवन की रक्षा करो। मेरे प्राण (स्वांस) बख्शो तथा भक्ति का दान दो। (188-189)

ऋषि दुर्वासा की दशा देखकर अंबरीष हँसने लगे और प्रसन्नचित से ऋषि दुर्वासा से बोले कि हे ऋषि जी! आप तो मुझे प्राणों से भी प्रिय हो। मैं आपका दास हूँ। अंबरीष ने सुदर्शन चक्र जो आग की लपटें छोड़ रहा था, हाथ से पकड़कर शांत करके दुर्वासा को अपने पास बैठाया। दुर्वासा के ऊपर मेहर की। कहा कि भक्ति भाव से रहा करो। मान-बड़ाई में जीवन नष्ट न करो। (190-192)

सुकर्मी पतिब्रता के अंग की वाणी नं. 112-115 का सारांश:-

जब परमेश्वर जी ने ऋषि दुर्वासा जी से स्पष्ट कह दिया कि आप अंबरीष के दरबार में जाओ। वे क्षमा करेंगे तो आपकी जान बचेगी, अन्यथा काल सिर पर नाच ही रहा है। तब ऋषि दुर्वासा को भीड़ी धरती हो गई यानि संकट में घिर गया और विचार किया कि मेरी ही (चूक) गलती पाई। सुदर्शन चक्र पीछा नहीं छोड़ रहा है। अब तो राजा अंबरीष ही पीछा छुड़ाएगा। वही जीवन दान देगा। राजा अंबरीष बोले कि हे दुर्वासा देव जी! मैंने कुछ नहीं किया। आपने जैसा किया, उसका फल ही मिला है। इसमें मेरा कोई दोष नहीं है।

ऋषि दुर्वासा ने निवेदन किया कि मेरी रक्षा करो। सुदर्शन चक्र को शांत करो। राजा अंबरीष ने सुदर्शन चक्र को शांत करके ऋषि को पकड़ा दिया। बोले कि ले तेरी मिसाईल, फिर गलती न करना। तब ऋषि दुर्वासा के जान में जान आई और अंबरीष को आशीस दी कि धन्यवाद! आप (प्रविन) विद्वान हो, महापुरूष हो।

अचला के अंग की वाणी नं. 133-134 का भी यह अर्थ है:-

दुर्वासा तथा अंबरीष की कथा का सारांश

संत गरीबदास जी ने वाणी में बताया है कि:-

गरीब, डेरै डांडै खुस रहो खुसरे लहै ना मोक्ष। ध्रुव प्रहलाद उद्धर गए डेरे में क्या दोष।।

अर्थात् जो साधक घर त्यागकर कर्म सन्यासी होकर साधना करते हैं, ब्रह्मचारी रहते हैं तथा वन में ही निवास करते हैं। वे मानते हैं कि परमात्मा ऐसे ही प्राप्त होता है। सामान्य व्यक्ति की धारणा भी यही होती है कि परमात्मा की प्राप्ति तो उन्हीं को होती है जो घर त्यागकर मोह-माया को छोड़कर जंगल में चला जाता है। इसका समाधान इस वाणी में संत गरीबदास जी ने किया है। कहा है कि अपने (डेरै) घर (डांडै) घेर {घेर वह स्थान होता था जिसमें किसान लोग पशु बाँधते थे तथा उसमें केवल पुरूष निवास करते थे। घर में केवल स्त्रिायाँ निवास करती थी। डंसम.थ्मउंसम का भिन्न स्थान बनाया जाता था। जो कुंवारे पुरूष होते थे। वे अपने घेर में ही रहा करते थे। जो विवाहित होते थे, वे ही रात्रि में अपनी पत्नियों के पास जा सकते थे।} इसलिए कहा है कि अपने घर या घेर में खुशी के साथ रहो। यदि ब्रह्मचारी जीवन बिताने मात्र से मुक्ति मिले तो खुसरे (हिजड़े) मुक्त क्यों नहीं होते जो जन्मजात ब्रह्मचारी हैं। आप यह भी मानते हो कि ध्रुव तथा प्रहलाद दोनों भक्तों का उद्धार हो गया। वे पार हो गए। उनकी मुक्ति हो गई। ये दोनों भक्त घर में रहे। विवाह कराया। बच्चे उत्पन्न किये और मुक्ति भी पाई। प्रहलाद का पुत्र बैलोचन (विरेचन) था। बैलोचन का पुत्र राजा बली था जिसने अश्वमेघ यज्ञ की थी। परमात्मा बावना (ठिगना) रूप बनाकर भिक्षा लेने गए थे।

परमात्मा कबीर जी द्वारा बताई सत्य साधना बिना मोक्ष नहीं होता। ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा काल ब्रह्म व अक्षर पुरूष को ईष्ट मानकर साधना करने से जीव का जन्म-मरण समाप्त नहीं होता। इसलिए उसे परम शान्ति नहीं मिलती। न सनातम परमधाम (शाश्वतम् स्थानाम्) प्राप्त होता जिसके विषय में गीता अध्याय 18 श्लोक 61-62 में कहा है कि गीता ज्ञान दाता काल ब्रह्म ने अपने से अन्य परमेश्वर की महिमा बताई। उसी परमेश्वर की शरण में जाने से परम शान्ति होती है तथा अमर लोक यानि सत्यलोक प्राप्त होता है।

उदाहरण:- राजा अंबरीष श्री विष्णु जी के अच्छे भक्त थे। घर में रहते थे। बाल-बच्चेदार थे। उनकी भक्ति की शक्ति के सामने कर्म-सन्यासी दुर्वासा ऋषि भी हार गया था। चरण पकड़कर अपनी जीवन रक्षा की भीख माँगी थी। वही अंबरीष वाली आत्मा त्रेतायुग में राजा जनक हुए जो घर में रहते थे तथा विवाहित थे। सीता जी के पिता थे। उनकी भक्ति के सामने कर्म-सन्यासी वनवासी ऋषि सुखदेव (शुकदेव) पुत्र ऋषि कृष्ण द्वैपायन यानि बेद ब्यास ने हार मानी और दीक्षा लेकर राजा को गुरू बनाकर स्वर्ग तक जाने की व्यवस्था की।

कलयुग में वही राजा अंबरीष व राजा जनक वाली आत्मा स्वर्ग में अपने पुण्यों को खर्च कर भारत देश में (वर्तमान में पाकिस्तान में) श्री कालूराम महता खत्री के घर जन्मा। श्री नानक नाम रखा। उस जीवन में भी श्री विष्णु जी की भक्ति करते थे। परमेश्वर कबीर जी उनको बेई नदी के किनारे मिले। यथार्थ अध्यात्म ज्ञान बताया। सच्चखण्ड (सत्यलोक) लेकर गए। अपनी यथार्थ स्थिति तथा शक्ति से परिचित करवाया। ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव व ब्रह्म का अस्तित्व दिखाया। फिर वापिस छोड़ा। तब श्री नानक जी ने काशी (बनारस) शहर में जाकर कबीर सतगुरू से सतनाम की दीक्षा लेकर जन्म-मरण से छुटकारा पाया। परम शांति प्राप्त की। सनातन परम धाम यानि सच्चखण्ड प्राप्त किया।

काल ने ऋषि दुर्वासा को प्रेरित किया था ताकि अंबरीष सत्य साधना त्याग दे और इसका इसी जन्म में पतन हो जाए। परमात्मा कबीर जी ने राजा अंबरीष की सत्य साधना की रक्षा की। काल नहीं चाहता कि जीव सत्य साधना करे।